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योग और योगा की शक्ति





मनोज कुमार श्रीवास्तव









मनोज कुमार श्रीवास्तव

9412047595 dio.hdr2010@gmail.com

सम्प्रति: सहायक निदेशक, सूचना एवं लोक सम्पर्क विभाग: प्रभारी अधिकारी, उत्तराखण्ड विधान सभा मीडिया सेन्टर, उत्तराखण्ड सरकार



लेखक की पूर्व प्रकाशित पुस्तक

  • मेडिटेशन के नवीन आयाम, प्रभात प्रकाशन (दिल्ली), 2016

  • आत्मदीप बनें, प्रभात प्रकाशन (दिल्ली), 2017

  • निर्णय लेने की शक्ति, वर्जिन साहित्यपीठ (दिल्ली), 2018

  • Be Your Own Light, वर्जिन साहित्यपीठ (दिल्ली), 2018

सम्मान:

  • विक्रमशीला हिन्दी पीठ द्वारा विद्यावाचस्पति (पीएचडी) मानद उपाधि

































दो शब्द



मनोज कुमार श्रीवास्तव जीवन की चुनौतियों को दार्शनिक पैमाने से विश्लेषित करते हैं। विश्लेषण के बाद समस्याओं का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करते हैं। इनके पूर्व पुस्तकों में भी सामान्य जीवन का दार्शनिक विश्लेषण किया गया है। इस विश्लेषण में समस्या को सामने रखकर सरल समाधान प्रस्तुत किया गया है। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में 2 फरवरी, 1971 को जन्मे, मनोज श्रीवास्तव ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय अकादमिक में प्रतिरक्षा अध्ययन, अर्थशास्त्र, प्राचीन इतिहास, आधुनिक इतिहास विषयों की पढ़ाई की। उत्तराखण्ड पीसीएस, 2002 बैच, प्रशासनिक सेवा में आने के बाद दर्शन के आधाभूत तत्व का व्यवहारिक विश्लेषण प्रारम्भ किया।

यह अकारण नहीं है कि इस पुस्तक में भी दार्शनिक पहलुओं की व्यवहारिक अभिव्यक्ति हुई है। पुस्तक के समस्त कथ्यों में मोटिवेशनल (प्रेरणा परक) प्रतिध्वनि देखी जा सकती है।









समर्पण



दादा लेखराज, ब्रह्मा बाबा-संस्थापक प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय































आभार

बह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय के विचारों पर आधारित ‘‘अवैकनिंग विद द ब्रह्माकुमारीज’’ टेलीविजन कार्यक्रम के अन्तर्गत बी0के0 सिस्टर शिवानी और फिल्म अभिनेता सुरेश ओबेराॅय के बीच दार्शनिक वार्ता एवं बी0के0 सिस्टर शिवानी-कनुप्रिया के साथ विभिन्न विषयों पर दार्शनिक वार्ता का उपयोग मानसिक योग की व्याख्या में की गई है।

आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध एवं होम्योपैथी(आयुष) मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रचारित पुस्तिका अन्तर-राष्ट्रीय योग दिवस, सामान्य योग दिवस, अभ्यासक्रम (प्रोटोकाल) - शारीरिक योग - अभ्यास अनुक्रम की सहायता से शारीरिक योग के महत्वपूर्ण पहलूओं को दर्शाया गया है।

पुस्तक रचना में अमूल्य सहयोग देने वाली धर्म पत्नी श्रीमती रश्मि श्रीवास्तव के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दर्शन शास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो0 ऋषिकान्त पाण्डेय एवं डा. शिप्रा मिश्रा ने पुस्तक लेखन में निरन्तर उत्साहवर्द्धन किया। मेरे सहायक श्री गोपाल सिंह बिष्ट और इंजीनियर राकेश श्रीवास्तव का अमूल्य सहयोग मिला।

इन सभी का हार्दिक आभार।



















भूमिका



पुस्तक लेखन का उद्देश्य 21 जून, अन्तर-राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर सम्मिलित प्रयासों में जागरूकता लाना है। जागरूकता लाकर आम जन तक योग का लाभ पहुचाना है। योग का सामान्य अर्थ मन और शरीर में सन्तुलन स्थापित करना एवं आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करना है।

योग और योगा को सामान्य प्रचलित अर्थों में देखा जाय, सामान्य व्यक्ति योग को योगा का नाम देकर योग का अर्थ मात्र शारीरिक व्यायाम के रूप में जानता है। परन्तु शारीरिक व्यायाम एवं प्राणायाम योग की प्रारंम्भिक स्थिति है। योग का अन्तिम लक्ष्य ईश्वर से योग लगाकर ऊर्जा प्राप्त करना है। ऊर्जा प्राप्त कर आत्म साक्षात्कार करना है।

आज के जीवन में हम इतने खो गये हैं कि ईश्वर या आस्था को भूलते जा रहे हैं। इसका मूल कारण है हमारे ऊपर अस्तित्ववादी प्रभाव। अर्थात् मेरा ही अस्तित्व है, केवल मैं हूं। केवल मैं से अहम आता है। इस प्रभाव से हम स्वतंत्रतावादी सोच से जीवन जीने लगते हैं। अस्तित्ववादी दार्शनिक सात्र कहता है कि मानव स्वतंत्र है और स्वतंत्रता के लिए अभिशप्त है। इस विचार से व्यक्ति अकेले जीवन जीना चाहता है। उसे समाज का ख्याल नहीं होता लेकिन व्यक्ति के जीवन में तो समाज का हस्तक्षेप आएगा ही। व्यक्ति इस हस्तक्षेप से बचना चाहता है और इसके लिए अनेक प्रकार के झूठ का सहारा लेना चाहता है। एक तो व्यक्ति समाज से झूठ बोलता है और दूसरा झूठ वह होता है जो व्यक्ति अपने आप से बोलता है। इसे आत्म प्रवंचना या बैड फैथ कहते हैं। अर्थात् व्यक्ति गुड फेथ, गाॅड आस्था (फेथ) व ईश्वर को छोड़कर केवल अपने बल पर जीवन चलाना चाहता है।

जब व्यक्ति के सामने चुनौतियां, कठिनाईयां आती हैं, तो वह अपने को अकेला पाता है। इसमें व्यक्ति असफल होता है तो व्यक्ति में कुंठा, हताशा, निराशा व अवसाद जन्म लेता है। समाज, मित्र, सगे संबंधी, ईश्वर को इसका दोष देता है। हमें अगर सही जीवन जीना है तो हमारे पास आस्था के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। व्यक्ति के पास आज सूचनाओं को अंबार है, परन्तु ज्ञान नहीं है। जिनके पास ज्ञान है, उनके पास अहंकार है। अहंकार के बिना ज्ञान विवेक कहलाता है। यदि हमारे पास विवेक है, अर्थात सही विचार हैं तो हम प्रत्येक क्षेत्र में सफल होंगे।

वैज्ञानिक रूप में जहां सभी चीजों का व्यवसायीकरण हो रहा है वहां हमें यह भी देखना होगा कि उन चीजों का क्या मूल्य है जो व्यवसाय से संबंधित न होकर शुद्ध आत्मचिंतन से संबंधित हैं।

यह सत्य है कि वैज्ञानिक युग में टैक्नोलाजी का महत्व बड़ा है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जहां इससे हमारी भौतिक सुविधाओं में वृद्धि हुई है वहीं दूसरी ओर हमारी आंतरिक अशांति में भी अपार वृद्धि हुई है। आज हम ऐसे विश्व में रह रहे हैं जहां सब कुछ रिमोट दबाते ही उपलब्ध हो जाता है। इसके बावजूद मनुष्य को शांति नहीं है। प्रशन उठता है ऐसा क्यों है? इसका एकमात्र उत्तर है आत्मचिंतन का अभाव। केवल आत्मचिंतन ही हमें अशांति से मुक्ति दिला सकता है। क्योंकि शांति का स्थान ही आत्मा है। यदि आधुनिकता की अंधी दौड में हम मानवीय मूल्यों को बचाने में असमर्थ रहते हैं तो विकास की संपूर्ण अवधारणा एक दिवास्वप्न के रूप में प्रतीत होगी, जहां केवल पश्चाताप ही अवशिष्ट के रूप में बचेगा।

मानवीय व्यक्तित्व के दो पक्ष हैं - शरीर (जड़) और आत्मा (चेतन)। यहां विकास का अर्थ केवल बौद्धिक विकास (शरीर) से नहीं बल्कि आत्मिक विकास भी उसका एक अभिन्न पक्ष है जिसका किसी भी परिस्थिति में परित्याग करना उचित नहीं है।

भारत में गरीबी व भुखमरी के बावजूद रूस व अन्य देशों की तरह क्रांति नहीं हुई है। क्योंकि यहां की भूमि अघ्यात्म से ओत प्रोत है। यहां गरीबी व भुखमरी को मनुष्य द्वारा किये गये कर्मों के प्रतिफल के रूप में स्वीकार किया गया है। यही नही यहां किसी आततायी के अत्याचार को भी यह मानकर सहन कर लिया जाता है कि एक न एक दिन ईश्वर उसे अवश्य दंड देगा। इसलिए यह कहना गलत है कि इस प्रकार के मनोविज्ञान, अवधारणा साधारण मनुष्य को क्या देगा। पहले भारत सोने की चिड़िया था। क्योंकि हम अध्यात्मिक चिंतन पर बल देते थे।

हमें अध्यात्मिक संतुष्टि व सामाजिक संतुष्टि में भेद करना होगा। एक फिल्म स्टार का कहना है कि शिवलिंग पर चढ़ाये गये एक गिलास दूध का मूल्य 20 रूपये होता है और हम इस 20 रूपये से एक गरीब का पेट भर सकते हैं। इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि उस एक्टर की फिल्म का टिकट 300 रूपये का होता है और यदि हम उस एक्टर की अगली फिल्म न देखकर किसी भूखे को भोजन करायें तो हम 15 बार उस भूखे को भोजन करा सकते हैं।

प्राचीन काल के बाद आधुनिक काल में पहली बार स्वामी रामदेव ने योग संबंधी विशिष्ट ज्ञान को आम जनता के बीच में लाने का कार्य किया। स्वामी रामदेव द्वारा विशिष्ट ज्ञान योग जो कुछ लोगों तक सीमित था, इसका सरलीकरण करके इसके व्यावहारिक एवं सकारात्मक परिणाम लोगों के सामने रखकर अपने दावे को पुष्ट किया। इसके परिणाम स्वरूप आर्थिक रूप से वंचित आम जन भी डाक्टर के चंगुल से बचकर अपना स्वास्थ्य संबंधी लाभ पा रहे हैं।

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले प्रधानमंत्री है जिनके प्रयास से संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को ‘‘योग दिवस’’ के रूप में घोषित किया। प्रधानमंत्री ने योग की महत्ता को समझा और विश्व रंगमंच पर योग की स्वीकार्यता व महत्ता को स्थापित किया। अब योग सीमित व विशिष्ट दायरे से निकलकर विस्तृत व आम दायरे तक पहुंचने लगा है।

कहना न होगा कि जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए हमें विचारों को प्रबन्धन करना होगा और पूर्वाभासी ज्ञान अर्जित करना होगा। यह हम मेडिटेशन व ध्यान से कर सकते हैं।

योग, भारतीय परम्परा एवं संस्कृति की अमूल्य उपलब्धि है। मानव जीवन में योग का अर्थ शरीर, मन, विचार, कर्म के बीच सन्तुलन स्थापित करना है। इसका उद्देश्य आत्मसयंम के माध्यम से आत्मस्थ होकर मानव प्रकृति के बीच सन्तुलन स्थापित करना है एवं स्वस्थ्य रहकर मानव कल्याण के लिए कार्य करना है।

समकालीन विश्व का सार्वाधिक लोकप्रिय दर्शन अस्तित्ववाद का जन्म द्वितीय विश्व युद्ध के बाद समाज में फैले अवसाद, कुण्ठा, पलायन, दर्द, हताशा, अकेलापन, सन्त्रास के पश्चात हुआ। अस्तित्ववाद के प्रमुख चिन्तक सात्र ने मानव अस्तित्व को प्रमुखता दी। उन्होंने ईश्वर, आत्मा जैसे आन्तरिक पक्ष को नकार दिया। सात्र का कथन है, मैं हूँ, इसलिए सोचता हूॅ।

अस्तित्ववाद का यह दर्शन आन्तरिक एवं भावनात्मक समस्या का समाधान करने में असफल रहा। वास्तव में अस्तित्ववाद का जन्म पूर्व भारतीय दार्शनिक एवं आध्यात्मिक दर्शन के विरूद्ध हुआ था। समाज में फैले अवसाद, कुण्ठा, पलायन, दर्द, हताशा, अकेलापन, सन्त्रास, समस्या के समाधान में भारतीय दार्शनिक एवं आध्यात्मिक दर्शन पूर्णतः समर्थ है। भारतीय दर्शन के शिखर पुरूष शंकराचार्य के अनुसार मैं हूॅ इसलिए मैं सोचता हूॅ। अर्थात पहले आत्मा का अस्तित्व है इसके बाद हमारे शरीर का अस्तित्व है। इसी बात को पाश्चात्य दार्शनिक रेने देकार्त कहते हैं - मैं हूँ, इसलिए मैं सोचता हूॅ।

भारतीय दर्शन के शिखर पुरूष शंकराचार्य के अनुसार आत्मा के विषय में सन्देह करने से ही आत्मा का अस्तित्व सिद्ध होता है। क्योंकि यह उसका मूल स्वरूप है। निषेध करने से निषेध कर्ता का अस्तित्व सिद्ध होता है।

य एव हि निराकर्ता तदैव तस्य स्वरूपम

शंकराचार्य के अनुसार आत्मा के अस्तित्व के लिए प्रमाण की भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि सभी प्रमाण अन्ततः आत्मा पर ही आधारित हैं। दुनियां में स्वयं से अनुभव से बढ़ कर कोई प्रमाण नही होता है।

पुस्तक में योग-मेडिटेशन के मानसिक पक्ष पर अधिक बल देते हुए शारीरिक पक्ष पर भी बल दिया गया है।



मनोज कुमार श्रीवास्तव, सहायक निदेशक,

सूचना एवं लोक सम्पर्क विभाग

मो0 9412074595















योग का उद्भव - इतिहास और दर्शन



योग का अर्थ केवल व्यायाम नहीं है बल्कि स्वयं को जानना एवं पहचाना भी है। विश्व एवं प्रकृति में एक ही आत्मा की पहचान करना है। योग हमारे जीवनशैली में आमूल-चूल परिवर्तन लाकर जागरूकता उत्पन्न करता है। शरीर में होने वाले सकारात्मक परिवर्तन से हम बाहरी प्राकृतिक परिवर्तन को सहन करने में सक्षम सिद्ध होते हैं।

सारांश में कहा जाए तो योग आध्यात्मिक अनुशासन एवं सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित ज्ञान है। यह शरीर और मन के बीच सन्तुलन स्थापित करता है। योग स्वस्थ जीवन की कला के साथ विज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है। यौगिक ग्रन्थों के अनुसार योग अभ्यास से वैयक्तिक चेतना सार्वभौमिक चेतना के साथ जुड़ जाता है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है वह परमाणु प्रकटीकरण मात्र है। जिस व्यक्ति ने योग के माध्यम से इस बात की अनुभूति कर लिया है, वह योगी कहलाता है। योगी पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर इस जीवन में जीवन मुक्ति और शरीर त्याग के बाद विदेह मुक्ति को प्राप्त करता है। इसे ही भारतीय दर्शन एवं परम्परा में मुक्ति, निर्वाण, कैवल्य अथवा मोक्ष कहा जाता है।

योग का प्रयोग सूक्ष्म अथवा आन्तरिक विज्ञान के रूप में भी किया जाता है। जिसके माध्यम से मनुष्य शरीर एवं मन के बीच सन्तुलित स्थापित कर आत्म साक्षात्कार को प्राप्त करता है। योग अभ्यास एक साधना है, जो सभी प्रकार के दुःखों अर्थात् त्रिविध दुःखों से मुक्ति दिलाता है। योग के माध्यम से व्यक्ति जीवन में पूर्ण स्वतंत्रता के साथ स्वस्थ प्रसन्न रहकर सभी के साथ सामंजस्य का अनुभव करता है।

योग व्यक्ति की शारीरिक क्षमता, व्यक्ति के मन एवं भावनायें एवं ऊर्जा स्तर के अनुरूप कार्य करता है। इसे व्यापक रूप में चार वर्गों में विभाजित किया गया है। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग एवं क्रियायोग।

कर्म योग में हम शरीर का प्रयोग करते हैं। ज्ञान योग में हम मन का प्रयोग करते हैं। भक्ति योग में भावना का प्रयोग करते हैं। क्रियायोग में ऊर्जा का प्रयोग करते है। महत्वपूर्ण बात यह है कि योग की जिस भी प्रणाली का हम अभ्यास करते हैं वह एक दूसरे से आपस में कई स्तर पर मिलीजुली होती है। प्रत्येक व्यक्ति इन चारों प्रकार के योग कारकों का अदभुत संयोग है। लेकिन केवल एक समर्थ गुरू ही योग साधक को उसके आवश्यकतानुसार मूलभूत योग सिद्धान्तों का लाभ दिला सकता है। इसीलिए कहा गया है योग समर्थ गुरू के मार्ग दर्शन में करना अत्यन्ता आवश्यक है।

योग आधुनिक रोग मधुमेह, श्वसन रोग, उच्च रक्त चाप, निम्न रक्त चाप, पर नियंत्रण प्राप्त करके रोग से मुक्ति दिलाता है। योग अवसाद, थकान, चिन्ता सम्बन्धि विकास और तनाव को कम करने में सहाकय होता हैं। योग मासिक धर्म को नियमित बनाता है। योग जीवन में सकारात्मकता का विकास करके मानव जीवन के सफलता का मार्ग खोलता है।

योग दिवस का प्रमुख संकल्प है - हमें अपने मन को सदैव सन्तुलित रखना है। इसमें ही हमारा आत्म विश्वास समाया है। मैं खुद के प्रति, कुटुम्ब के प्रति, काम, समाज और विश्व के प्रति शान्ति आनन्द और स्वास्थ्य के प्रचार के लिए प्रतिबद्ध हूॅ।

प्राचीन काल के बाद आधुनिक काल में पहली बार स्वामी रामदेव ने योग संबंधी विशिष्ट ज्ञान को आम जनता के बीच में लाने का कार्य किया। स्वामी रामदेव द्वारा विशिष्ट ज्ञान योग जो कुछ लोगों तक सीमित था, इसका सरलीकरण करके इसके व्यावहारिक एवं सकारात्मक परिणाम लोगों के सामने रखकर अपने दावे को पुष्ट किया। इसके परिणाम स्वरूप आर्थिक रूप से वंचित आम जन भी डाक्टर के चंगुल से बचकर अपना स्वास्थ्य संबंधी लाभ पा रहे हैं।

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले प्रधानमंत्री है जिनके प्रयास से संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को ‘‘योग दिवस’’ के रूप में घोषित किया। प्रधानमंत्री ने योग की महत्ता को समझा और विश्व रंगमंच पर योग की स्वीकार्यता व महत्ता को स्थापित किया। अब योग सीमित व विशिष्ट दायरे से निकलकर विस्तृत व आम दायरे तक पहुंचने लगा है।

27 सितम्बर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने योग के अर्थ एवं महत्ता को विश्व के सामने रखा। 11 दिसम्बर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 193 सदस्यों ने रिकार्ड 177 सह-समर्थक देशों के साथ 21 जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का संकल्प लिया।

प्रथम योग दिवस आयुष मंत्रालय ने 21 जून 2015 को नई दिल्ली में आयोजित कर प्रतिभागियों के 35985 संख्या की दृष्टि से गिनीज विश्व रिकार्ड बनाया। सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए योग विषय पर 21 एवं 22 जून 2015 को दो दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठि आयोजित की गई। जिसमें विदेश के 13 सौ प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

योग विद्या का उदभव हजारों वर्ष पूर्व माना जाता है। श्रुति परम्परा के अनुसार भगवान शिव योग विद्या के प्रथम आदियोगी हैं। हजारों वर्ष पूर्व हिमालय के सरोवर झील के निकट आदियोगी ने योग का गूढ ज्ञान पौराणिक सप्तऋिषियों को दिया था। भारतीय उप महाद्विपों में भ्रमण करने वाले सप्त ऋषियों एवं अगस्तमुनि ने इस योग संस्कृति को जीवन दर्शन के रूप में विश्व के प्रत्येक भाग में प्रसारित किया।

योग का व्यापक स्वरूप तथा उसका परिणाम सिन्ध एवं सरस्वती नदी घाटी सभ्यताओं 2700 ईसा पूर्व का प्रतिफलन माना जाता है। योग का अभ्यास पूर्व वैदिक काल में किया जाता था। महर्षि पतंजलि ने उस समय के प्रचलित योग अभ्यासों को व्यवस्थित एवं वर्गीकृत किया। उन्होंने पातंजलयोगसूत्र नामक ग्रन्थ के माध्यम से विश्व के सम्मुख रखा।

पतंजलि के बाद आनेक ऋषियों एवं आचार्यों ने इस ज्ञान के विकास में परिवर्धन एवं संवर्धन किया। योग का अर्थ केवल व्यायाम नहीं है बल्कि स्वयं को जानना एवं पहचाना भी है। विश्व एवं प्रकृति में एक ही आत्मा की पहचान करना है। योग हमारे जीवनशैली में आमूल-चूल परिवर्तन लाकर जागरूकता उत्पन्न करता है। शरीर में होने वाले सकारात्मक परिवर्तन से हम बाहरी प्राकृतिक परिवर्तन को सहन करने में सक्षम सिद्ध होते हैं।

सारांश में कहा जाय तो योग आध्यात्मिक अनुशासन एवं सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित ज्ञान है। यह शरीर और मन के बीच सन्तुलन स्थापित करता है। योग स्वस्थ जीवन की कला के साथ विज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है। यौगिक ग्रन्थों के अनुसार योग अभ्यास से वैयक्तिक चेतना सार्वभौमिक चेतना के साथ जुड़ जाता है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्माण्ड मंे जो कुछ भी है वह परमाणु प्रकटीकरण मात्र है। जिस व्यक्ति ने योग के माध्यम से इस बात की अनुभूति कर लिया है, वह योगी कहलाता है। योगी पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर इस जीवन में जीवन मुक्ति और शरीर त्याग के बाद विदेह मुक्ति को प्राप्त करता है। इसे ही भारतीय दर्शन एवं परम्परा में मुक्ति, निर्वाण, कैवल्य अथवा मोक्ष कहा जाता है।

योग का प्रयोग सूक्ष्म अथवा आन्तरिक विज्ञान के रूप में भी किया जाता है। जिसके माध्यम से मनुष्य शरीर एवं मन के बीच सन्तुलित स्थापित कर आत्म साक्षात्कार को प्राप्त करता है। योग अभ्यास एक साधना है, जो सभी प्रकार के दुःखों अर्थात् त्रिविध दुःखों से मुक्ति दिलाता है। योग के माध्यम से व्यक्ति जीवन में पूर्ण स्वतंत्रता के साथ स्वस्थ प्रसन्न रहकर सभी के साथ सामंजस्य का अनुभव करता है।

योग व्यक्ति की शारीरिक क्षमता, व्यक्ति के मन एवं भावनायें एवं ऊर्जा स्तर के अनुरूप कार्य करता है। इसे व्यापक रूप में चार वर्गों में विभाजित किया गया है। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग एवं क्रियायोग।

कर्म योग में हम शरीर का प्रयोग करते हैं। ज्ञान योग में हम मन का प्रयोग करते हैं। भक्ति योग में भावना का प्रयोग करते हैं। क्रियायोग में ऊर्जा का प्रयोग करते है। महत्वपूर्ण बात यह है कि योग की जिस भी प्रणाली का हम अभ्यास करते हैं वह एक दूसरे से आपस में कई स्तर पर मिलीजुली होती है। प्रत्येक व्यक्ति इन चारों प्रकार के योग कारकों का अदभुत संयोग है। लेकिन केवल एक समर्थ गुरू ही योग साधक को उसके आवश्यकतानुसार मूलभूत योग सिद्धान्तों का लाभ दिला सकता है। इसीलिए कहा गया है योग समर्थ गुरू के मार्ग दर्शन में करना अत्यन्ता आवश्यक है।

पारम्परिक योग सम्प्रदाय में अलग-अलग सम्प्रदाय पराम्परा, दर्शन पर आधारित पठन-पाठन आरम्भ हुआ। इनमें ज्ञान योग, भक्तियोग, कर्म योग, पातंजल योग, कुण्डलिनी योग, हठ योग, ध्यान योग, मंत्र योग, लय योग, राज योग एवं बौद्ध योग, जैन योग की भी समृद्ध परम्परा मिलती है। प्रत्येक सम्प्रदाय के अलग-अलग दृष्टिकोण और प्रक्रिया है। परन्तु सभी सम्प्रदाय का मूल उद्देश्य शरीर एवं मन को स्वस्थ रखकर आत्म साक्षत्कार करना है।

योग साधनाओं में यम, नियम, आसन, प्रणायाय, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, बन्ध एवं मुद्रा आदि साधनाओं का अभ्यास किया जाता है।

योग आधुनिक रोग मधुमेह, श्वसन रोग, उच्च रक्त चाप, निम्न रक्त चाप, पर नियंत्रण प्राप्त करके रोग से मुक्ति दिलाता है। योग अवसाद, थकान, चिन्ता सम्बन्धि विकास और तनाव को कम करने में सहाकय होता हैं। योग मासिक धर्म को नियमित बनाता है। योग जीवन में सकारात्मकता का विकास करके मानव जीवन के सफलता का मार्ग खोलता है।

योग दिवस का प्रमुख संकल्प है- हमें अपने मन को सदैव सन्तुलित रखना है। इसमें ही हमारा आत्म विश्वास समाया है। मैं खुद के प्रति, कुटुम्ब के प्रति, काम, समाज और विश्व के प्रति शान्ति आनन्द और स्वास्थ्य के प्रचार के लिए प्रतिबद्ध हूँ।





















राजयोग - मानसिक योग



चकाचैंध भरी दुनिया में सही रास्ता दिखाती है मेडिटेशन एवं ध्यान। हम निश्चित व अनिश्चित चुनौतियों का सामना सामान्य दिनचर्या में करते हैं। इन चुनौतियों का सामना करने से हम दुविधाग्रस्त रहते हैं। मेडिटेशन एवं ध्यान से इस प्रकार की दुविधा का अन्त होता है। मेडिटेशन से अन्तज्र्ञान, पूर्वाभासी ज्ञान (इनट्यूटिव ज्ञान) विकसित होता है। सामान्य बौद्धिक ज्ञान व अन्तज्र्ञान मिलकर सभी प्रकार की चुनौतियों का सामना करने में पूर्ण सक्षम हैं। हम सिर्फ बौद्धिक ज्ञान से जीवन की समस्याओं का समाधान करने में असफल रहते हैं।

दुनिया की चाल तेज है। जब हम इस चाल के साथ नहीं बढ़ पाते तो अवसाद (डिपरेशन) होता है। अवसाद (डिपरेशन) का समाधान मेडिटेशन/ध्यान से मिलता है। दवाएं अवसाद (डिपरेशन) का अस्थाई समाधान देती हैं परन्तु स्थाई समाधान मेडिटेशन से ही मिलता है। सामान्य ढंग से कठोर परिश्रम से हम वहीं उपलब्धि हासिल कर सकते हैं, जितना परिश्रम किया गया है, परन्तु मेडिटेशन का सहारा लेकर हम लम्बी छलांग (क्वांटम जम्प) मार सकते हैं।

मेडिटेशन द्वारा हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व में सन्तुलन आता है। मानव व्यक्तित्व के दो पक्ष होते है- बुद्धि पक्ष व हृदय पक्ष। बुद्धि का कार्य तोडना या विश्लेषण करना है, हृदय का कार्य समन्वय या जोडना है। बुद्धि द्वारा अस्वीकार भाव की उत्पत्ति होती है, तो हृदय द्वारा स्वीकार भाव की उत्पत्ति होती है। जीवन की उपलब्धि में दोनों की महत्ता है, परन्तु इसका सही अनुपात होना चाहिए, जो हमें मेडिटेशन सीखाता है। मनुष्य में अपार सम्भानवाएं व क्षमता विद्यमान है।

मनुष्य अपनी अपार संभावनाओं व क्षमताओं में से कुछ क्षमता को पहचानता भी है। जब मनुष्य अपनी इस क्षमता का भी प्रयोग नहीं कर पाता है, तो वह अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार होता है। 40 देशों में लेक्चर देने वाले साइकोथिरेपिस्ट डा0 गिरीश पटेल का मानना है कि मेडिटेशन भी एक प्रकार की लत (एडिक्शन) है। मेडिटेशन करने से शरीर के लिए सहायक, आवश्यक और निश्चित मात्रा में कैमिकल स्रावित होता है। यह शरीर के लिए लाभदायक होता है। व्यसन से प्रभावित नशेड़ी (ड्रगिस्ट) भी जब ड्रग लेता है तो भी शरीर में कैमिकल का स्राव होता है, परन्तु यह मात्रा आवश्यकता से बहुत अधिक होती है, जो शरीर के लिए हानिकारक होता है।

ब्रह्माकुमारीज संस्था द्वारा चलाये जाने वाला सहज राजयोग हमारे शरीर के लिए सुलभ, सहज व कारगर विधि के रूप में सामने आया है, क्योंकि यह पूर्णतया मानसिक विचार व मानसिक प्रक्रिया पर आधारित है। डाॅ0 सतीश गुप्ता का मानना है कि 95 प्रतिशत बीमारी मानसिक कारणों से होती है। माउण्टआबू सहज राजयोग के प्रयोग व अध्ययन का अन्तर्राष्ट्रीय केन्द्र है। इसके अतिरिक्त देश-विदेश में लगभग 09 हजार सेन्टर 130 देशों मे कार्य कर रहे सेन्टर सहज राजयोग के प्रयोग व अध्ययन का केन्द्र के रूप में कार्य कर रहे हंै। यहाँ पर महत्वपूर्ण बात यह है कि मेडिटेशन कीे विभिन्न अवस्था हैं और सफल अवस्था में एक विधि या संस्था या विचारधारा से अनासक्त भाव (डिटैच) होकर ही सर्वोच्च लाभ पाया जा सकता है।

जीवन में सफलता के लिए हमें अपने मजबूत व कमजोर भाग की जानकारी होना आवश्यक है। इसीलिए हमारा भारतीय दर्शन ‘अपने को जानो’ कथन पर बल देता आया है। यदि हम अपने को नहीं जानते है तो संदेह, भ्रम, दिक्भ्रम, विभ्रम और अवसाद होता है। संदेह अर्थात दो वस्तु में कौन सही है कौन गलत यह तय न कर पाना। भ्रम अर्थात रस्सी को सांप समझना। दिकभ्रम दिशा का भ्रम। विभ्रम अर्थात सामने कोई वस्तु नहीं है फिर भी किसी वस्तु का अस्तित्व मान कर फैसला करना। इन सभी समस्याओं से हमें बचाता है मैडिटेशन।

अपने बारे में जानने को उपनिषद् में एक कहानी द्वारा बताया गया है। दस अज्ञानी ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से घर से निकलते हैं। रास्ते में पड़ने वाली नदी को पार करने के दौरान सभी अज्ञानियों ने हाथ कस कर पकड़ लिया की कही कोई छूट न जाये। नदी पार करने पर सभी अज्ञानी बारी-बारी से अपने दस साथी की गिनती में 9 साथी ही पाते थे क्योकी सभी अपने को छोड़ कर गिनती कर रहे थे। ऐसा पाकर सभी रोने लगे। तभी वहाँ से गुजरने वाले एक ब्रह्म ज्ञानी ने सम्पूर्ण गिनती कर बताया तुम दस ही हो। तुम अपने को छोडकर गिनती कर रहे थे। दसवाँ साथी तुम स्वयं हो तुम अपने को भूल गए हो। ब्रह्म ज्ञानी ने तत्त्वमसि की शिक्षा दिया। इस ज्ञान से अज्ञानियों को अहम् ब्रहमास्मि का ज्ञान हुआ।

अध्यात्मिकता भी एक प्रकार का ज्ञान है। आज के दौर में अध्यात्मिकता शब्द को लेकर लोगों के दिमाग में संन्यास का चित्र बनता है अर्थात अध्यात्मिक व्यक्ति दुनिया, वैभव, परिवार, समाज को छोडकर एकान्तवासी हो जायेगा। यह गलत धारणा है। हम यह भी सोचते हैं कि हमारे जीवन में अनेक लक्ष्य, जिम्मेदारियां है। हमसे वहीं पूरा नहीं हो सकती, तो मेडिटेशन करने से हमारा जीवन का एक अन्य आयाम खुल जायेगा। यहाँ तो मरने तक की भी फुर्सत नहीं है। हम जीवन में अनेक लोगों से मिलते हैं, तो क्या अपने लिए थोडा समय नहीं निकाल सकते? हम दुनियाभर की सूचनाएं (इन्फारमेशन) रखते हैं, हम धरती से लेकर चाँद तक की जानकारी रखते हैं लेकिन अपने अन्दर क्या चल रहा है इसकी जानकारी नहीं रखते। अर्थात दिया तले अंधेरा। जब तक हमें यह ज्ञात नहीं होगा कि हमारे अन्दर क्या चल रहा है, तब तक बाहर हमें क्या करना है स्पष्ट नहीं होगा।

जीवन के चार महत्वपूर्ण आयाम है:

  1. शारीरिक अवस्था

  2. मानसिक अवस्था

  3. सामाजिक अवस्था

  4. अध्यात्मिक अवस्था

पहले तीन आयाम में इतनी ऊर्जा का क्षय हो जाता है कि हम चैथी अवस्था की ओर ध्यान नहीं दे पाते। चैथी अवस्था को महत्वहीन मानते हैं। परन्तु हमें यह जानना होगा कि हमारे लिए यदि संतुलित विकास करना है, तो जीवन के सभी पक्षों पर बल देना पडेगा। ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि अध्यात्म पर बल देते हुए हम अन्य पक्षों की उपेक्षा करते चलें।

कुछ लोग इसे धर्म से जोड़ते हैं। लेकिन यह धर्म नहीं है। यह स्वयं सुधार (सैल्फ इम्प्रूवमैंट) का प्रभावशाली विधि (पावरफुल टैकनीक) है। राजयोग बिना ज्ञान के सम्भव नहीं। मेडिटेशन की अन्य विधि में विचारहीन क्रिया में ज्ञान की आवश्यता नहीं होती। मैडिटेशन को धर्म से जोड़ा जाता है। जबकि मैडिटेशन हमें अध्यात्म सिखाता है। धर्म तथा अध्यात्म में अन्तर है। धर्म पिंजरे का पंछी है, जबकि अध्यात्म मुक्त पंछी। अध्यात्मिक व्यक्ति के लिये धार्मिक होना जरुरी नहीं है, परंतु धार्मिक व्यक्ति तब तक अध्यात्मिक नहीं हो सकता जब तक वह अपने धर्म को अपने जीवन में नहीं उतरता है या धर्म की अनुभूति नहीं करता है। आज हम धर्म के नाम पर खून-खराबा कर रहे है। मैडिटेशन हमें अध्यात्मिक बना कर इससे बचाता है।

आजकल मेडिटेशन एक प्रकार का प्रदर्शन प्रभाव (फैशन स्टेट्स सिम्बल) बन गया है कि मेडिटेशन करना है। आज के फैशन के दौर में मेडिटेशन की बढ़ती उपयोगिता व आवश्यकता के कारण इसका व्यवसायिक उपयोग किया जा रहा है और मार्केटिंग की जा रही है। इस कारण आम व्यक्ति को जीवन में संदेह (कनफ्यूजन) पैदा होता है कि उन्हें वास्तव में क्या करना चाहिए। हमें यह चुनना होगा कि हम जो विधि अपना रहे हैं, उस विधि से हमें कितना लाभ हो रहा है। मेडिटेशन के कई चरण हैं। प्रारम्भ से अन्तिम चरण तक कुछ--कुछ हमें उपलब्धि व लाभ प्राप्त होगा।

निर्णय आपको करना है। सहज राजयोग इसका बेहतर विकल्प है। राजयोग एक ऐसा योग है जिसमें हम स्वयं पर नियन्त्रण करना सीखते हैं। स्व पर राज करना ही राजयोग है। मेडिटेशन को सरल शब्दों में कहा जाये तो यह विचारों का प्रबन्धन है। इससे तनाव, क्रोध, ईष्र्या, इत्यादि को दूर किया जा सकता है। इसमें नकारात्मक विचार, संकल्प के स्थान पर सकारात्मक विचार, संकल्प पर बल दिया जाता है। राजयोग मेडिटेशन में संवाद (कम्यूनिकेशन), सम्बन्ध (कनैक्शन), ऊर्जा प्राप्त करना (चार्जिंग) विधि महत्वपूर्ण है। विचारों के प्रबन्धन में वाच-कैच-मैच की विधि उपयोगी है। कम्यूनिकेशन, कनैक्शन, चार्जिंग के अन्तर्गत आत्मा का परमात्मा से सम्बन्ध स्थापित कर वार्तालाप किया जाता है। यह संवाद (कम्यूनिकेशन) द्विमार्गी होता है, आत्मा का परमात्मा एवं परमात्मा का आत्मा से। इस संवाद से आत्मा ऊर्जा युक्त (चार्ज) हो जाती है। यह क्रिया विचारों का प्रबन्धन कहलाता है। इसमें आने वाले नकारात्मक विचारों को वाच किया जाता है, फिर इसको कैच किया जाता है तत्पश्चात इसका सकारात्मक विचार के साथ मैच कराकर इसे रूपान्तरित किया जाता है।

मेडिटेशन में विचारों का दमन नहीं किया जाता है, बल्कि इसमें विचारों को नियंत्रित करते है। इसके बाद इसे चैनलाईज करते हुए सही मार्ग दे दिया जाता है। अर्थात् दमन के स्थान पर विचारों पर नियंत्रण किया जाता है। हमारी बुद्धि का स्वभाव है विचार करना। अगर इसके दमन का प्रयास करेंगे, तो अधिक फोर्स से बाहर आयेगी। राजयोग में आत्मा को परमात्मा से सहज एवं सरल रूप में जोडने का अभ्यास किया जाता है और यह इतनी आसान विधि है कि इसकी अनुभूति कुछ ही दिनों में अन्य विधि की अपेक्षा बहुत जल्दी और बहुत आसानी से प्राप्त होने लगती है।

राजयोग में आत्मा-परमात्मा का जो सम्बन्ध स्थापित होता है, इनके बीच सम्बन्ध इसलिए आसानी से होता है, क्योंकि दोनों के गुणों सम्बन्धी प्रकृति में पूर्णतया समानता पायी जाती है जैसे आत्मा का मूल स्वरूप प्रेम है, उसी प्रकार परमात्मा का मूल स्वरूप प्रेम का सागर है। दोनों के बीच में ट्रांसमीटर और रिसीवर का सम्बन्ध स्थापित होता है। कोई भी रिसीवर ट्रासंमीटर द्वारा भेजे गये तरंगों को तभी पकड सकता है, जबकि दोनों की आवृत्ति में समानता हो। क्योंकि जब आवृत्ति में असमानता होगी तो ट्रांसमीटर एवं रिसीवर के मध्य सम्बन्ध स्थापित नहीं होगा।

विज्ञान की भाषा में देखें तो प्रत्येक कण से इलक्ट्रो मैग्नेटिक रेडियेशन निकलता है। ट्रांसमीटर एवं रिसीवर के मध्य तब ही सम्बन्ध स्थापित होगा जब दोनों के मध्य सेम फ्रीक्वेन्सी होगी। हम देखते हैं यहाँ आत्मा और परमात्मा के गुणों में समानता होने के कारण इनके तरंगों की आवृत्ति में समानता पायी जाती है। इसलिए राजयोग के समय हम परमात्मा के साथ सीधा सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं।

योग की अन्य विधियों में मंत्र अथवा प्रार्थना को माध्यम बनाया जाता है, परन्तु मंत्र तो हम बार बार बिना समझे पढते हैं लेकिन हम इसका ठीक-ठीक अर्थ न जान पाने के कारण इसकी अनुभूति नहीं कर पाते। इसी प्रकार जब हम प्रार्थना करते हैं, तो हम एक तरफा बातचीत करते हैं। लेकिन योग का मतलब दो तरफा बातचीत है, जोकि हमें सहज राजयोग सिखाता है।

हमारी परम्परा के अनुसार योग का अर्थ मन या आत्मा को ईश्वर से जोडना है या योग लगाना है। लेकिन आज के व्यवसायिकता के दौर में योग शब्द को योगा शब्द के रूप में अधिक जाना पहचाना जा रहा है। योगा शब्द को शारीरिक शुद्धिकरण या व्यायाम तक सीमित करके देखा जा रहा है, लेकिन हमें योग और योगा दोनों शब्दों में अन्तर करना होगा। योगा, योग नहीं है।

योग की विस्तृत व्याख्या महर्षि पतंजलि ने अपने योगदर्शन में आष्टांगिक मार्ग के रूप में किया है। शरीर को आत्मा से व आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का नाम ही योग है। योग के विभिन्न रूप होते हैं, जिसमें राजयोग, तन्त्रयोग, भक्त योग, कुण्डलनी योग, नाद योग, सिद्ध योग, बुद्धि योग, लय योग, शिव योग, ध्यान योग, समाधि योग व अष्टांग योग इन सभी योग विद्याओं में अष्टांग योग को सम्पूर्ण योग कहा गया है।

  1. यम-शरीर मन व वाणी का संयम है। यह निषेधात्मक आदर्श है। योग दर्शन में यम को सत्य, अहिंसा, अस्तय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के रूप में देखा गया है।

  2. नियम -यह भावात्मक आदर्श है। जैसे - संतोष, तप। नियम में तप, संतोष, सोच और ईश्वर शरणागति पांच नियम हैं। इससे शारीरिक व आत्मिक शक्तियां बलवति होती हैं।

  3. आसन-पदमासन, मयूरासन, गरूडासन। सुख पूर्वक बैठने को आसन कहा गया है। योग क्रियाओं की सिद्धि के लिए आसन का होना जरूरी है। आसन तभी सिद्ध माना जा सकता है, जब साधक तीन घण्टा छत्तीस मिनट तक बिना हिले डुले सहज रूप में एक ही आसन में बैठ सके।

  4. प्राणायाम - श्वास के संयम की क्रिया है। इसके तीन अंग हैं - पूरक, कुम्भक, रेचक। आसन के स्थिर होने पर श्वास, प्रश्वास की गति को विस्तार देना ही प्राणायाम है। बाहर की वायु को अन्दर खीचना पूरक है व अन्दर की वायु को बाहर निकालना रेचक है। यह क्रिया केवल नासिका द्वारा होनी चाहिए। श्वास-प्रश्वास की गतियों का बाहर वाह्य कुम्भक व भीतर अन्तः कुम्भक द्वारा लयबद्ध तरीके से रोकना ही प्राणायाम है।

  5. प्रत्याहार- इंद्रियों को विषयों से हटाना या इंद्रियों का संयम। यम, नियम और प्राणायाम आदि क्रियाओं से सिद्ध की वृत्तियों को बाहर की ओर से अन्दर की ओर करने से सुख मिलता है। वह अन्तर्मुखी हो जाता है और जब इन्द्रिया चित्त के नियन्त्रण में चलने लगती हैं, तो प्रत्याहार की स्थिति आ जाती है।

  6. धारणा - किसी विशेष बिंदु पर चित्त या मन को स्थिर करना। चित्त की चंचलता को नष्ट करने के लिए उसे एक विशेष स्थान पर ठहराने का अभ्यास करने को धारणा कहते हैं।

  7. ध्यान - इसमें एक ही ज्ञान का प्रभाव होता है अन्य ज्ञान का मिश्रण नहीं होता है। अतः एक ही विचार होता है। जहाँ चित को ठहराया जाये, उसे वृत्ति में बने रहना ध्यान है। धारणा की परिपक्व अवस्था का नाम ही ध्यान है।

  8. समाधि - ध्यान को सिद्ध करने वाला साधक समाधि की अवस्था में पहुंचता है। यहां मन या आत्मा का वाह्य जगत से संपर्क टूट जाता है। आत्मा अपने मूल स्वरूप में पहुंच जाती है।

इनमें से यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार योग के बहिरंग साधन हैं और अंतिम तीन धारणा, ध्यान, समाधि योग के अंतरंग साधन है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार तो ध्यान की पूर्व की अवस्था है। अभी तक हम ध्यान लगाने की तैयारी कर रहे थे।

हमें यह पहचानना होगा कि कौन योगी है एवं कौन भोगी है। क्योंकि दर्पण से तब तक हम ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते, जब तक हमारे पास विवेक न हो। इसे एक कहानी द्वारा भी समझा जा सकता है। मास्टर पतंगा अन्य सभी साथी पतंगों के साथ बैठकर मीटिंग कर रहा था, तभी एक दूसरा पतंगा कहीं और से आकर सूचना देता है कि चलो-चलो दीपक जल गया है। सभी पतंगे दीपक की ओर चलने को तैयार होते हैं, तभी मास्टर पतंगे ने सभी को रोककर बोला कि सूचना देने वाला या तो पतंगा नहीं है, या तो यह पतंगा झूठ बोल रहा है, क्योंकि यदि वास्तव में यह पतंगा होता तो दीपक छोडकर हमें यह सूचना देने नहीं आता।

भारतीय परम्परा में कुण्डलनी जागरण व चक्र भेदन पर बल दिया जाता है। जो निम्नलिखित है:

  1. मूलाधार चक्र - यह स्टेमना या जैव ऊर्जा से सम्बन्धित होता है। इसके नीचे कुण्डलनी स्थित होती है। यह रीड की हड्डी के नीचे जहाँ यह समाप्त होती है। यहाँ डिप्रेशन या गड्ढ़ा होता है।

  2. मणिपुर चक्र - पाचन तन्त्र से सम्बन्धित होता है। नाभि या नेवल पर होता है।

  3. स्वाधिष्ठान चक्र - यह तन्त्रिका तन्त्र या नर्वस सिस्टम से सम्बन्धित होता है। पसलियों के मिलन बिन्दु पर डिप्रेशन या गड्ढा स्थल पर होता है।

  4. अनहद चक्र - यह रक्त संचार से सम्बन्धित होता है। हृदय के मध्य में जहाँ रूद्राक्ष रखा जाता है अथवा जहाँ डिप्रेशन या गडढ़ा होता है। वहाँ यह अवस्थित होता है।

  5. विशुद्ध चक्र - यह इमोशन या भावना से सम्बन्धित होता है। यह छाती के ऊपर व गर्दन के नीचे बीच में जहाँ गड्ढ़ा या डिप्रेशन होता है।

  6. आज्ञा चक्र - यह तार्किक क्षमता, बुद्धि विवेक से सम्बन्धित है। भृकुटि पर दोनों भौहों के मध्य जहाँ डिप्रेशन गड्ढ़ा होता है।

  7. सहसत्रार चक्र - यह पारलौकिक अनुभव से सम्बन्धित है। सिर के ऊपर मध्य में या नवजात शिशु के तालु पर डिप्रेशन या गड्ढ़े के रूप में होता है।

सामान्य अवधारणा के अन्तर्गत माना जाता है कि मेडिटेशन इत्यादि जीवन के सभी दायित्व पूर्ण करने के पश्चात सेवानिवृत्त (रिटायरमैन्ट) के समय किया जायेगा, परन्तु मेडिटेशन का वास्तविक कार्य जीवन में आने वाली चुनौतियों से निपटने की शक्ति प्रदान करना है, इसलिए इसको बढ़ती जिम्मेदारियां व चुनौतियां के आने के पूर्व ही प्रारम्भ कर देना चाहिए, तभी हम इसका असली लाभ प्राप्त कर सकेंगे। मेडिटेशन हमें यह सिखाता है कि हम जो भी कार्य (व्यवसाय, पेशा, सेवा, गृहस्थ जीवन) करंेगे उसे कैसे अधिक कुशलता से किया जाए।

राजयोग मेडिटेशन के अन्तर्गत जितनी सुबह उठकर फ्रैश होने के पश्चात मेडिटेशन किया जाये, वह उतना ही अधिक लाभदायक है, क्योंकि उस समय वायुमण्डल, वातावरण बहुत शांत होता है। इसको इस प्रकार से समझा जा सकता है कि यदि हमें कही जाना है तो सुबह जल्दी निकलना चाहिए, ताकि ट्रेफिक कम से कम मिले। इससे बहुत कम समय में बिना बाधा के अपनी मंजिल पर पहंुच जाते हैं। इसलिए अच्छा है कि जल्दी उठकर फ्रैश होकर मेडिटेशन के लिए बैठ जायें। इस समय मन बहुत एक्टिव नहीं होता, क्योंकि दिन की शुरूआत है, सुबह जल्दी उठने पर कम विचार पैदा होते हैं, विचारों की संख्या समय के साथ बढ़ती जाती है।

मेडिटेशन को सामान्य अर्थों में ध्यान कहा जाता है। इसका लक्ष्य अंतध्र्यान होना है। जब हम प्रारम्भ में शांत होकर बैठते हैं तो हमें बाहर की ध्वनियां सुनाई पड़ती हैं। धीरे-धीरे बाहर की ध्वनियां सुनाई देनी बंद हो जाती है और अब अंदर की ध्वनियां सुनाई पड़ती हैं। यह अंर्तध्यान की अवस्था है। यह ध्वनियां श्वांस, रक्तसंचार इत्यादि की होती हैं।

प्रारम्भिक चरण में शान्तचित बैठकर लगभग 15 मिनट ऊपर से नीचे धीरे-धीरे अपने अन्दर प्रत्येक अंग में होने वाले अनुभवों को वाच किया जाता है और इस बीच आने वाले विचारों को पहचाना जाता है। लोग कहते हैं कि मेडिटेशन में हमें नकारात्मक विचार आते हैं। मेडिटेशन करते समय नकारात्मक विचार का आना भी अच्छा लक्षण है, क्योकि अभी तक हमें यह पता ही नहीं चलता था कि हमारे अन्दर नकारात्मक विचार भी हैं। मानव प्रवृत्ति है कि वह अपने अन्दर की कमियों को स्वीकार नहीं करता है। यह समस्या बौद्धिक वर्ग के साथ ज्यादा है, क्योंकि वह बुद्धि व तर्कों से अपनी कमियों को छिपाकर अपनी इगो को संतुष्ट करता रहता है। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। एक डाक्टर एक मरीज के निकले हुए पेट पर आपत्ति करता है तो मरीज अपने पक्ष में कुछ तर्क देता है। जैसे - ऊंचाई (हाईट) के अनुसार मेरा वजन ठीक है, हमें कोई समस्या नहीं है, हमने सारे टेस्ट करा रखें हैं, मैं खाते पीते घर का हूं। जब व्यक्ति सामने प्रत्यक्ष चीज को नकार रहा है तो अंदर की चीज को कैसे स्वीकार करेगा।

मेडिटेशन के समय शरीर से हम अनाशक्त (डिटैच) होते जाते हैं, और अपनी ऊर्जा भृकुटि के मध्य ध्यान केन्द्रित (फोकस) करते हैं। धीरे-धीरे प्रतीत होता है यह शरीर है ही नहीं, या शरीर बिल्कुल हल्का होता जा रहा है। राजयोग में आगे चलकर हमें आंख बंद करने की भी जरूरत नहीं होगी। हम खुली आंखों से भी आन्तरिक यात्रा कर सकते हैं। अगर खुली आंखे रखकर आन्तरिक यात्रा करने का अभ्यास हो जाता है, तो चलते फिरते अपना सामान्य कार्य करते हुए भी यह आन्तरिक यात्रा की जा सकती है।

मेडिटेशन द्वारा इस समस्या से निजात पाया जा सकता है, क्योंकि मेडिटेशन में व्यक्ति अपने से बात करता है, अपने अन्दर देखता है। समान्यतः यदि किसी व्यक्ति से यह कहा जाये कि वह अपने तीन कमियां, तीन अच्छाईयां बता दे तो व्यक्ति अपनी कमियां तो तुरन्त बता देता है, लेकिन अच्छाईयां जानने के लिए किसी अपने नजदीकी मित्र को जिम्मेदारी सौप देता है। प्रश्न इस बात का है कि जब व्यक्ति अपनी खूबियाँ ही नहीं जानता तो बडे संकल्प कैसे पूरा कर पायेगा।

मेडिटेशन करने से जहाँ याददाश्त (मैमोरी) बढ़ती है वहीं व्यर्थ व नकारात्मक संकल्प समाप्त होते जाते हैं। इससे हमारी एकाग्रता बढेंगी और कम समय में अधिक ऊर्जा शक्ति से काम कर सकेंगे। आजकल की सबसे बडी समस्या पीयर प्रेशर और आत्म विश्वास की कमी होना है। मेडिटेशन से जहाँ हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है, वहीं पीयर प्रेशर से जो गलतियां कर देते हैं, जैसे सिगरेट इत्यादि पीना उससे बच जाते हैं। हमारा बहुत समय तनाव, ईष्र्या एवं इगो की वजह से बर्बाद हो जाता है। मेडिटेशन इन सभी को नियन्त्रित करती है तथा हमारी रचनात्मकता एवं निर्णय क्षमता बढ़ जाती है। कहावत भी है स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ मन होना आवश्यक है। आजकल प्रोफेशनल जीवन में पूर्वाभासी (इंटयूटिव) होना आवश्यक है, क्योंकि समय की चाल बहुत तेज है। मात्र तार्किक रूप से हम चुनौतियों का सामना करने में असमर्थ रहते हैं।

आत्मा में सात मौलिक गुण बताएं गए हैं:

  1. शान्ति

  2. सुख

  3. प्रेम

  4. शक्ति

  5. ज्ञान

  6. पवित्रता

  7. आनन्द

कहा गया है आत्मा का स्वरूप ही इन गुणों को लेकर बना है। परमात्मा को इन गुणों का सागर कहा गया है। परमात्मा को इन गुणों को पावर हाउस कहा गया है। इस पावर हाउस से आत्मा के मूल स्वरूप गुणों की चार्जिंग हो जाती है। चार्जिंग तो न्यूनाधिक दो आत्माओं के मध्य संवाद करने से हो सकती है, परन्तु यह चार्जिंग अल्पकाल व अस्थायी प्रवृत्ति की होती है। पूर्ण चार्जिंग व स्थायी प्रवृत्ति की चार्जिंग तो परमात्मा से ही हो सकती है।

डा0 गिरीश पटेल के अनुसार मानव में जाग्रत अवस्था के दौरान सामान्य रूप से एक सेकेण्ड में 25 से 30 विचार आते हैं। इनमें से अधिकांश विचार नकारात्मक अथवा अनावश्यक होते हैं। इन विचारों को सजगतापूर्वक मोड़ना और सही दिशा देना या चैनलाईज करना आवश्यक होता है। इसके पांच चरण हैं:

  1. सजगता या अवेयरनैस कि हमारे अन्दर कौन सा विचार चल रहा है

  2. इसे कैच करना अर्थात कौन सा विचार या शब्द हमारे अवसाद का कारण है

  3. इसे अण्डरलाईन करना

  4. स्टाॅप करना

  5. ट्रांसफार्म अथवा परिवर्तित करना। इसमें सजगता बहुत महत्वपूर्ण है।

यदि हम सजग है, तो विचार पैदा होने से पूर्व हम इसे पकड सकते हैं। जब यह क्रिया करते हैं, तो देखते हैं कि विचार स्वतः ही 25-30 से घटकर कम होने लगते हैं। लोग पूछ सकते हैं कि इनमें सबसे कठिन स्टेज कौन सा है। उत्तर में कहा जा सकता है कि यह पूछा जाना चाहिए इसमें सबसे आसान स्टैज कौन सा है। सभी स्टेज एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। मेडिटेशन तो किसी भी समय किया जा सकता है, परन्तु इसके लिए समय व स्थान निश्चित हो तो अधिक बेहतर परिणाम प्राप्त होगें। इसमें प्रातःकाल 04 से 06 का समय सर्वोत्तम माना जाता है।

प्रातःकाल दिमाग (माइन्ड) एक दम शांत होता है। इस दौरान मन के अन्दर चलने वाला द्वन्द्ध (कन्फल्क्टि) आसानी से पकडकर इसका समाधान निकाला जा सकता है। इसे सुबह-शाम, निश्चित समय व स्थान पर किया जाना चाहिए। मेडिटेशन में सजगता का बहुत महत्व है। इसमें ‘मैं’ का सजगता या अवेयरनैस होता है। इगो के कारण मनुष्य मैं को नहीं जानता।

हम सभी को समय देते हैं, परन्तु अपने को जानने के लिए हमारे पास समय ही नहीं है। हम कहते हैं कि हमें मरने तक की फुर्सत नहीं है। अपने को जानना या मैं की पहचान करना है तो मेडिटेशन करने के लिए किसी स्थान पर शांत बैठकर प्रारम्भ में शरीर के प्रत्येक अंग को एक निश्चित क्रम में ऊपर से नीचे तक फील या अनुभव करें कि हमारे अन्दर क्या चल रहा है।

हमें माथे से लेकर क्रम पूर्वक नीचे नाभि तक फील करना है कि प्रत्येक अंग में कैसा अनुभव हो रहा है। जैसे जीभ में कैसा लग रहा है, ठंडा - गरम अथवा मीठा कडवा इत्यादि। धीरे - धीरे नाभि के पास पहुंच कर अपने श्वांस पर ध्यान केन्द्रित करना है कि कैसे हमारी सांस अंदर से बाहर और बाहर से अंदर आ रही है। धीरे धीरे सांसों की गति धीमी होने लगेगी और हमारा शरीर हल्का होने लगेगा।

शरीर के प्रत्येक अंग पर डिटैच होकर साक्षी भाव से देखें मन में क्या चल रहा है। स्वयं से प्रश्न करें कि मन में क्या चल रहा है, उत्तर आपकों स्वयं मिलता चलेगा। गहरे विचार (डीप रूटैड थाॅट्) गहरे मन में चलने वाला विचार जो हमें परेशान करता था, वह ऊपर आ जायेगा। तब इसे कैच, अण्डरलाईन तथा फिर स्टाॅप करके सही दिशा दी जा सकती है। यह विचार इस प्रकार से हो सकता है कि मेरा दोस्त बहुत अंहकारी हो गया, मुझे इसको ठीक करना है।

नकारात्मक विचार आना अच्छा है, क्योंकि अब हम इसे पहचानने लगे हैं। बैठे-बैठे एक विचार आता है, मेरे पिताजी प्लैन से आ रहे हैं, कहीं यह प्लैन क्रेश न हो जाये। इस विचार को सजगतापूर्वक कैच करें, अण्डरलाईन करे, तत्पश्चात स्टाप करें। विचार करें कि मेरे पिताजी प्लैन से आ रहे हैं, कहीं यह प्लैन क्रेश न हो जाये। - स्टाॅप, मेरे पिताजी प्लैन से आ रहे हैं, कहीं? - स्टाप, मेरे पिताजी .....- स्टाप । अब इस विचार को सही दिशा दें और विचार करें कि मेरे पिताजी पिछली बार सुरक्षित आये थे और आने के बाद हम लोग बहुत खुश हुए थे।


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